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संभल जाओं, वर्ना Corona किसी को बख्शेगा नहीं

ये जिंदगी अनमोल है, दोबारा नहीं मिलेगी हमने अभी दुनिया नहीं देखी है, लेकिन लोग नहीं मान रहे. रोजाना कोरोना के मामले बढ़कर आ रहे हैं तो वहीं मौत के आंकड़े नए सिरे से लोगों को रोंगटे खड़े कर रहे हैं. अस्पतालों में बेड़ नहीं, ऑक्सीजन नहीं, दवाईयां नहीं, वहीं श्मशान घाटों में अंतिम संस्कार के लिए जगह नहीं, लकड़ियां नहीं हैं. हालत बद से बदतर हो चुके हैं. कोरोना विकराल रूप ले चुका है. चारों ओर हाहाकार है. 

सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी कोरोना थमने का नाम नहीं ले रहा है. मोदी सरकार ने कोरोना के रोकथाम के लिए मुख्यमंत्रियों पर जिम्मेदारी छोड़ दी है. वहीं कुछ प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों ने जिम्मेदारी जिले के डीएम को सौंपी दी, तो डीएम ने शहर के प्रतिनिधियों के भरोसे लोगों को छोड़ दिया. अब आम आदमी करे तो क्या करे? मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तो दमोह उपचुनाव को लेकर लोगों से खुलकर बाहर आने की अपील कर डाली. अब जनता करे तो क्या करे! क्या होगा देश का प्रदेश का? नेताओं के भाषणों से तो ऐसा लगता है कि मानो अब आम जनता आत्मनिर्भर नहीं, बल्कि कोरोना वायरस को आत्मनिर्भर हो जाना चाहिए. कुल मिलाकर सब भगवान भरोसे है.

कोरोना के ऐसे महाविकराल क्रूर काल में भगवान से ही प्रार्थना कर सकते हैं कि, हे प्रभू अब बस करो, अपने गुस्से को काबू में कर लो. धरती के इंसान को पहले से ही नेताओं ने बर्बाद करके रखा है, अब कोरोना काल में मानव जाति संकट में आ गई है, चारों तरफ मौत का मंजर है. घर में जब भी कभी किसी अपने का फोन आता है तो डर लगने लगता है और तो और जब समाचार मिलता है की सामने वाला कोरोना का निवाला बन गया है तो और लोग अपने आपको सुरक्षित महसूस करने में सक्षम नहीं हो पाते हैं. इंसान जब सुबह उठकर एक क्षण के लिए भगवान से प्रार्थना करता है कि हे भगवान कोरोना से बचाओ, तो वहीं दूसरे क्षण में अखबार में छपी अंतिम संस्कार स्थलों के दर्दनाक चित्र डरा कर रख देते हैं.

लोगों को दो गज की दूरी रास नहीं आती है, लोग मास्क पहनना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. लेकिन भूलो मत कोरोना से पहले भी एड्स, इबोला और निपाह जैसे गंभीर और खतरनाक वायरस ने दुनिया उजाड़ दी थी. ये सब वायरस लोगों को आगाह कर चुके हैं, लेकिन हम अभी भी इन सबको नजरअंदाज कर रहे हैं. ऑक्सीजन, बेड, श्माशन में अंमित संस्कार के लिए दो गज की जगह की खोज में लगे हुए हैं. घर-घर में मातम पसरा हुआ है, चीख पुकार मची हुईं है. अभी भी समय है संभलने का, नहीं तो दुनिया को खत्म होने से कोई नहीं रोक सकता.

विकास जैन


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