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भनक तक नहीं लगी और ऐसे फैल गया कोरोना

भारत में कोरोना की दूसरी लहर ने कोहराम मचा रखा है. रोजाना लाखों मरीजों के साथ हर दो मिनट में एक मौत होने लगी है. चारों ओर चीख पुकार मची है. इस भयानक त्रासदी का कहर कहां जाकर रूकेगा इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता, लेकिन हिंदुस्तान को भनक तक नहीं लगी और कोरोना तेजी से देश में फैल गया, भारत ने कोरोना को काबू करने का मौंका गंवा दिया.

भारत में त्रासदी से मौतों का सिलसिला जारी है. देश में मौत के आंकड़ों से लोग डरे सहमे हैं. हालात ऐसे हो गए हैं कि कोरोना दबे पांव आता है और मौत का उपहार देकर चला जाता है. किसी को जरा सी भनक तक नहीं लगती की मौत हमारे कितने नजदीक है. वहीं कोरोना पर काबू पाने के लिए रणनीति बनाने वालों को भी कोरोना बेवकूफ बना गया एक वक्त था जब फरवरी में बधाइयां दी जा रही थीं कोरोना पर जीत का ऐलान किया जा रहा था, राजनेता विश्व गुरू बनने का सपना देख रहे थे और लोगों को दिखा रहे थे दूसरे देशों को वैक्सीन की खेपे भेजी जा रही थीं. हम कोरोना की जीत में इतने मग्न हो गए और भूल गए कि यूरोप, अमेरिका जैसे देशों में कोरोना की दूसरी लहर ने फिर दरवाजा खटखटा दिया है.

हम ये सोच बैठे थे की दूसरी लहर हमारे देश का कुछ नहीं बिगाड़ सकती और देश में सब कुछ खोल दिया गया होटल, जिम, सिनेमाघर, मॉल बाजार सब कुछ खोल दिया. शादियां होने लगी, जुलूस, रैलियां निकाली जाने लगीं. इतना ही नहीं पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का ऐलान हो गया. सत्ता की लालच में चूर राजनेता चुनाव की तैयारियां करने लगे, लेकिन उन्हें नही पता था की कोरोना की लहर भारत में एक बार फिर से तबाही मचाने की तैयारी कर रही है. हालांकि कोरोना की दूसरी लहर से पहले वैक्सीन के डोज देने का काम शुरू हो चुका था, लेकिन टीका अभियान की शुरूआत कछुआ चाल से हुई और चुनाव के मग्न सरकार टीकाकरण में तेजी नहीं ला पाई. टीका अभियान के पहले चरण में डॉक्टर, पुलिस, सेना के जवानों और कोरोना वॉलेंटियरों को टीका लगाने का काम शुरू हुआ, लेकिन बहुत कम मात्रा में लोगों ने टीका लगवाया. सरकार के अनुसार पहले चरण में 3 करोड़ लोगों को टीका लगाया जाना था, लेकिन रजिस्ट्रेशन 36 लाख ही हुए तो लोगों ने टीका लगवाना बेवकूफी समझा. लोगों को लगा जब सरकार के नौकरशाही लोग टीका नहीं लगवा रहे तो हमें क्या जरूरत, कोरोना तो भाग गया बिना टीका के भी काम चलाया जा सकता है, लेकिन सरकार ने इस बात पर गौर नहीं किया क्योंकि सरकार तो चुनाव में जो व्यस्त थी.

पांच राज्यों के चुनावों में रैलियां पर रैलियां निकाली गई, रोड़ शो किए गए, लोग मास्क लगाए हैं की नहीं, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हो रहा है कि नहीं नेताओं को इससे कोई मतलब नहीं रहा, नजीता यह हुआ कि बंगाल में 30 मार्च को मात्र 628 मामले दर्ज किए गए, लेकिन 18 अप्रैल को कोरोना ने एक दम छलांग मारी जिसके बाद 6910 मामले दर्ज किए गए. ऐसा कुछ तमिलनाडू, असम और केरल में भी हुआ. कुल मिलकार चुनावी भीड़ ने कोरोना को आमंत्रण दे डाला. यही वजह है कि आज अस्पतालों में बिस्तर नहीं हैं, श्मशानों में जगह नहीं, लकड़ियां नहीं हैं, कब्रिस्तानों में जगह नहीं है, चारों ओर मौत का मंजर है, किसी के घर का चिराग बुझ गया तो किसी के सिर से बड़ों का हाथ उठ गया, कहीं बुढ़े मां बाप ने अपना लाल खो दिया तो किसी माता पिता ने दिल का टुकड़ा चला गया. अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, वक्त हमारे हाथ में है. आज संभल गए तो जिंदगी है. नहीं तो कुछ भी नहीं. केवल श्मशान रह जाएंगे इंसान खत्म हो जाएगा.


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