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ढोकले की जमेगी धाक, या रोशोगुल्ला करेगा राज

ढोकले की जमेगी धाक, या रोशोगुल्ला करेगा राज

अगर कोई आपसे पूछे कि ढोकला खाना पसंद करेंगे कि रोशोगुल्ला. लेकिन अगर आप खाने के शौकीन होंगे तो दोनों ही पसंद करेंगे, क्योंकि एक मीठा है तो दूसरा खट्टा-मीठा. आप हैरत में होंगे कि भरे कोविड काल में अचानक ढोकला और रोशोगुल्ला कैसे याद आ गया. दरअसल 2 मई आने वाली है. दो मई को देश के पांच राज्यों के चुनावों के नतीजे भी आएंगे. इसलिए ये सवाल है कि आपको ढोकला पसंद है कि रोशोगुल्ला.

बंगाल चुनावों के समय आपको याद होगा कि ढोकला और रोशोगुल्ला की बाते भी आईं थीं. दीदी ने चौथे चरण की चुनावी सभा में कहा था हम हमारा रोशोगुल्ला खाएंगे, तुम तुम्हारा ढोकला खाओ. बात एकदम साफ थी कि ममता बनर्जी का मतलब साफ था कि बंगाल के लोग ममता बनर्जी को ही पसंद करेंगे. भले ही बीजेपी तमाम कोशिश कर ले, लेकिन बंगाली मानुष तृणमूल के साथ ही होगा.

देश एक है, लेकिन राज्यों में हमेशा खींचतान रही. मुंबई में भी कमोबेश गुजराती और मराठी का झगडा है कि बंगाल में बंगाली और मारवाडी का. लेकिन प्रतीक के तौर पर ढोकला और रोशोगुल्ला की एंट्री चुनाव में होने के साथ चुनाव भी चटपटा और स्वादिष्ट हो गया.

दरअसल ढोकला और रोशोगुल्ला की लड़ाई पुरानी है. कहा जा सकता है कि आजादी के समय की. जब अहिंसा के लिए बापू सत्याग्रह किया करते थे तो सुभाष चंद्र बोस आजाद हिंद फौज तैयार करते थे. बहरहाल उस दौर की आजादी की लड़ाई रही हो या आज के चुनावों की लड़ाई. दोनों ही लड़ाई में रोशोगुल्ला को लगता है कि ढोकले ने उसका हिस्सा ले लिया. कमोबेश बंगाल के इन चुनावों में भी रोशोगुल्ला की मिठास कम न हो इसके लिए ममता बनर्जी ने ढोकले और रोशोगुल्ला को प्रतीक बनाकर सीधे-सीधे जता दिया कि बंगाल का आदमी बंगाली मानुष को ही चुनेगा भले ही बीजेपी बाहरी लोगों के साथ कितने ही दवाब क्यों न बना ले.

ममता दीदी ने इसी डर से ही रोशोगुल्ला की मिठास कहीं बंगाल में कम ना होने पाए, इसलिए रोशोगुल्ला और ढोकले का दांव चल दिया. दीदी को उम्मीद है कि बंगाली खाएगा तो रोशोगुल्ला, लेकिन दो मई के आते तक चुनावी नदी में बहुत सारा पानी बह गया. दीदी के पैर में चोट और फिर व्हील चेयर से शुरू हुई कहानी नंदीग्राम की हिंसा बाहरी लोग और फिर आरोप प्रत्यारोपों से गुजरती हुई, कोविड के कहर तक जा टिकी.

राजनैतिक दलों ने बड़े पैमाने पर रैलियां और प्रचार नहीं करने का फैसला लिया. इस बीच ममता दीदी ने बार-बार बयानों को ही बदल लिया. उन्होंने सफाई दे डाली कि उन्होंने कभी प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री को बाहरी नहीं कहा, लेकिन क्या वजह है कि चुनाव शुरू होने से लेकर खत्म होते एक दूसरे के लिए आक्रामकता और बयानबाजी की आग उगलने वाले दल एकदम खामोश हो गए.

आखिरी दौर की वोटिंग हो चुकी है. सभी के भविष्य EVM में बंद हैं और सबको इंतजार है कि दो मई को क्या होगा. रोशोगुल्ला अकेले भी राज कर सकता है या ढोकला अपनी धाक जमा सकता है. कहीं ऐसा न हो कि बंगाली मानुष रोशोगुल्ला लगातार खाने के बाद स्वाद बदलने के लिए किसी खट्टे मीठे पर जाएगा. ऐसा भी हो सकता है कि स्वाद बदलने के एक्सपेरिमेंट में रोशोगुल्ला की चासनी को खट्टी मीठी कर दे या फिर ढोकले को रोशोगुल्ला की चासनी में ही डाल दे. कुछ भी हो सकता है. मतलब साफ है अगर रोशोगुल्ला ने राज किया तो ठीक, ढोकले ने धाक जमाई तो भी ठीक, लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो बंगाल की जनता के साथ-साथ राजनैतिक दल भी नए स्वाद के लिए तैयार रहें.

नोट:- ये लेखक के निजी विचार हैं, लेखक दीप्ति चौरसिया न्यूज नेशन में डिप्टी एडिटर हैं.

 


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