liveindia.news

बे‘बस’ मजदूर, ‘बस’ से बाहर सियासत

ये उत्तरप्रदेश का बस पुराण है. कहने को बस है पर जो चल रहा है उस पर किसी का बस नहीं है. कपिल शर्मा शो के बच्चा यादव की जुबान कहें तो बस चल्ला है... चल्ला है... पर चल क्या रहा है ये सबकी समझ से परे है. सियासत से मजदूरों को उनकी मंजिल तक पहुचाने को लेकर थी. पर मजदूरों का दर्द कब सियासी दलों का दर्द बन गया किसी को समझ नहीं आया. और मसला कुछ यूं पलटा की सियासत बस पर होती रही. बसें थमी रहीं और राजनीति तेज रफ्तार से दौड़ती रही.

चलिए हो तो नहीं पाएगा फिर भी पूरे मामले को समझने की कोशिश करते हैं. और इस बेबस सियासी टेप को तब तक रिवाइंड करते हैं जब तक प्रियंका गांधी या कांग्रेस को प्रवासी मजदूरों का दर्द न समझ आने लगे. दिल्ली, उत्तरप्रदेश और तमाम ऐसे प्रदेशों में गर्मी तो बीते तीन महीनों से चरम पर है. मजदूरों का पलायन उस वक्त से मान लेते हैं जब से लॉकडाउन शुरू हुआ. और उसके कुछ दिन बाद उन्हें काम और खाने पीने के लाले पड़ने लगे. बेबस मजदूर अपने घरों की ओर लौटने लगे. सूखते गले, तपते बदन और खून रिसते पैरों के साथ अंतहीन पलायन जारी रहा. जो तस्वीरें आईं उन्हें देखकर दिल पसीज जाए. आंखों में आंसु छलक उठे ये सब होना लाजमी था. लेकिन सियासतदां शांत रहे. राजनीति सिर्फ सरकार की अनदेखी, प्लानिंग की कमी. दूरदर्शिता की कमी जैसे तमाम बयानों तक सिमटी रही. खैर इंतजाम भी होते ही रहे. मजदूरों को घर तक पहुंचाने के लिए स्पेशल ट्रेने चलीं. हर राज्य सरकार मजदूरों को मदद पहुंचाने एक पैर पर तैयार भी दिखी.

इस बीच मजदूरों से जुड़ी चंद और घटनाएं हुईं. कभी ओरंगाबाद, कभी गुना तो कभी औरैया से दिला दिहला देने वाली घटनाओं की खबर आती रही. फिर भी ऐसी सियासत नहीं हुई जैसी उत्तरप्रदेश में अभी जारी है. पहले तो अचानक एक दिन कांग्रेस सांसद राहुल गांधी सड़क पर उतरे और एक जगह बैठ कर श्रमिकों का दर्द जाना. क्या उसी दिन अहसास हुआ कि इन मजदूरों के लिए कुछ करना चाहिए. और अपनी बहन प्रियंका गांधी को फोन खड़का कर कहा दीदी कुछ करो. और अचानक प्रियंका गांधी एक्टिव हो गईं. इसके बाद यूपी सरकार को प्रस्ताव दिया कि हम हजार बसें दे रहे हैं मजदूरों को घर भिजवाइए. यूपी सरकार ने भी बिना देर किए बसों की लिस्ट बुलवा ली. लो साहब, कांग्रेस ने लिस्ट भी भेज दी. लगा सब कुछ ठीक है. बेबस मजदूरों को बस मिल गई. अब जल्दी से घर पहुंच जाएंगे. पर फिर ब्रेक लग गया. पता चला कि जो लिस्ट है उसमें तो बाइक, स्कूटर और कार तक के नंबर है.

इसके बाद बसों के पहिए थमे रहे और सियासत की बेकाबू बस सड़क पर भाग निकली. प्रियंका गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस ली कहा कि यूपी सरकार चाहें तो बस पर बीजेपी के झंडे लगवा दे लेकिन मजदूरों को उनके घर पहुंचा दे. सारी बसें तयशुदा स्थान पर ही खड़ी हैं. अब बसे चलेंगी या नहीं, चलेंगी तो कब तक चलेंगी. फिलहाल इसका जवाब किसी के पास नहीं है. पर वो मजदूर, वो बेचारा मजदूर और उसका लाचार परिवार जो घर जाने की आस में तपती धूप में बैठा है. वो वहीं बैठा है. उसके पास तो न टीवी है, न ऐसा मोबाइल जिस पर ये सियासी तमाशा देख सके. शायद तपती दोपहरी का कुछ वक्त ही कट जाता. न उन मिम्स का सहारा है जो इस ग्रेट इंडियन पॉलीटिकल शो पर बनते. जिन्हें देखकर वो सूखे गले की प्यास भूल जाता. उसके पास कुछ है तो बस, बस के इंतजार के बेबसी और वो छोटा सा टुकड़ा जहां कम से कम उसे बैठकर बसों के चलने का इंतजार करने की मनाही फिलहाल नहीं है.


Leave Comments