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Corona काल लगातार बदलता राजनैतिक प्यार

कोरोना से सबसे ज्यादा बेहाल इस वक्त कोई राज्य है तो वो है महाराष्ट्र. रोज हजारों की संख्या में सक्रमितों का आना सारी मेडिकल व्यवस्थाओं को कम पड़ जाना और फिर शुरू होना राज्य और केंद्र सरकार पर जुबानी जंग. राज्य का केंद्र पर भेदभाव का आरोप और फिर मदद की गुहार. मदद मिलते ही फिर मोदी को बुरा भला कहने पर मलाल.

पूरी कहानी किसी हिंदी फिल्मों से कम नहीं लगती, लेकिन इन दिनों महाराष्ट्र राज्य की हकीकत शायद यही कुछ फिल्मी किस्म की स्टोरी है.

कोरोना ने महाराष्ट्र पर कहर बरपा रखा है. सरकार सिस्टम सब फेल नजर आ रहे हैं, लेकिन इस कठिन दौर में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का अचानक मोदी का मुरीद हो जाना कहीं न कहीं नई राजनैतिक खिचड़ी की खूशबू आ रही है. चलिए इस मुरीद होने के पीछे के पूरे घटना क्रम को हम समझते हैं. कोरोना से हैरान परेशान महाराष्ट्र के लोगों को बचाने के लिए मुख्यमंत्री ठाकरे ने मोदी से मदद की गुहार लगाई. ठाकरे ने कहा कि कोरोना की चेन को ब्रेक करने के लिए उन्हें ज्यादा वैक्सीन दी जाए. मोदी ने ठाकरे की मदद तीन दिन में ही कर दी. मोदी ने भारत बायोटेक में बनाई जा रही कोवैक्सीन (कोवैक्सिन) के उत्पादन के लिए मुंबई के हाफकिन इंस्टीट्यूट को अपनी अनुमति दे दी है. 

उसके बाद तो मुख्यमंत्री ठाकरे भी मोदी के मुरीद हो गए. हफ्ते भर पहले तक उद्धव के मंत्री मोदी पर भेदभाव का आरोप लगा रहे थे. कोरोना वैक्सीन को लेकर उद्धव और शरद पवार के सुर में जुदा-जुदा थे. उद्धव ठाकरे के मंत्री मोदी पर भेदभाव का आरोप लगा रहे थे तो शरद पवार केंद्र सरकार के साथ खड़े नजर आ रहे थे. इसी बीच एंटीलिया का मामला और अनिल देशमुख का इस्तीफा इन सबके बीच शरद पवार की मीटिंग अमित शाह के साथ होना और दूसरी ओर उद्धव ठाकरे का राज्य के कोरोना और राजनैतिक दोनों ही हालात पर बैचेन हो जाना. 

कोरोना को लेकर उद्धव ठाकरे की मोदी से मदद मांगना और मोदी से कुछ घंटो में ही मदद मिल जाना. फिर तो क्या उद्दव ने खुले दिल से मोदी की तारीफों के कसीदे कस दिए. सीएम उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए उन्हें धन्यवाद दिया है. 

वैसे देखने सुनने में तो सबकुछ देश के संघीय ढांचे की मिसाल और छुटपुट राजनैतिक उठापटक की तरह ही दिखता है, लेकिन अगर राजनैतकि चश्मे से देखें तो कहा जा सकता है कि पवार के साथ-साथ अब उद्धव ठाकरे भी बीजेपी से बतियाने के मौके तलाश रहे हैं, क्योंकि शिवसेना और एनसीपी के बीच पहले से ही सबकुछ बहुत बेहतर नहीं चल रहा है. ऐसे में शरद पवार की अमित शाह से मुलाकात कहीं न कहीं उद्धव ठाकरे के चैन और करार दोनों को छीन चुका था. यही वजह रही कि मदद के बाद खुले गले से तारीफ करना कहा जा सकता है कि शिवसेना अपने पहले प्यार बीजेपी को अभी तक भुला नहीं पाई है और जरूरत हुई तो नए राजनैतिक साथियों के साथ छोड़ बीजेपी के साथ गलबहैया भी कर सकती है.

दीप्ति चौरसिया

डिप्टी एडिटर, न्यूज नेशन


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