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कुश से लेकर मोदी तक : बार-बार बसी और उजड़ी है अयोध्या, जानिए कब कब बदली रंगत

अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।

तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः॥

अर्थ- आठ चक्र और नौ द्वारों वाली अयोध्या नगरी देवों की नगरी हैं.
जिसमें प्रकाश का कोष यानि खजाना है. जहां आनंद और प्रकाश दोनों मिलते हैं. 

नेशनल डेस्क : इस प्राचीन श्लोक को दोहराने का मतलब केवल इतना कि आप एक बार फिर ये याद कर सकें कि भगवान राम की अयोध्या यानि वो नगरी जो खुद देवों की बसाई नगरी मानी जाती है. जहां ज्ञान का प्रकाश है तो जीवन का आनंद भी है. शायद इसलिए भगवान राम ने खुद सरयू किनारे बसी इस  दिव्य नगरी को अपने जन्म के लिए चुना. रामायाण के अनुसार इस नगरी की स्थापना मनु ने की थी. जिसके बाद कई शताब्दियों तक ये सूर्यवंश की राजधानी रहा. भगवान राम का जन्म भी इसी वंश में हुआ था. पौराणिक कथाओं में ये भी दर्ज है कि जब भगवान राम बैकुंठवासी हुए तो अयोध्या का वो हिस्सा जहां भगवान राम का महल था, वो भी सरयू की गहराइयों में समा गई. भगवान राम के बाद सूर्यवंश की बागडोर उनके पुत्र लव और कुश के हाथों में थी. आगे चल कर कौशांबी के राजा हुए जिन्होंने वापस वीरान पड़ी अयोध्या को बसाया. और सबसे पहले यहां भगवान राम के मंदिर का निर्माण करवाया. राम मंदिर का इतिहास एक बार फिर उस काल से जुड़ गया. जब कौशांबी के राजा कुश ने उसी स्थान पर मंदिर निर्माण करवाया जहां राम जी का जन्म हुआ. बचपन बीता. और जहां वो बरसो बरस राज करते रहे. कालिसदास के ग्रंथ रघुवंश में इसका जिक्र मिलता है. 

साल गुजरे वक्त बदला. अयोध्या एक बार फिर उजड़ गई. इस बार अयोध्या को उसकी रौनक लौटाई उज्जैन के महाराज विक्रामादित्य ने. ईसा पूर्व की इस घटना का उल्लेख भविष्य पुराण में मिलता है. जिसके अनुसार भगवान विष्णु के परमभक्त विक्रमादित्य ने अयोध्या ने 360 भव्य मंदिरों का निर्माण करवाया. इसके बाद सीधे अयोध्या का वही इतिहास मिलता है जो अंग्रेजों के दौर से शुरू हुआ. जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद और रामजन्मभूमि का विवाद जन्म ले चुका था. उस विवाद पर जाएं उससे पहले हिंदु पक्ष के एक और दावे के आधार पर एक पुराना इतिहास जान लेना जरूरी है. अदालत में हिंदुपक्ष ने ये दावा किया था कि बाबर से पहले 1033 में सालार मसूद ने भी राम जन्मभूमि पर बने मंदिरों को ध्वस्त कर दिया था. सालार मसूद को भी एक मुस्लिम आक्रमणकारी बताया गया है. सालार मसूद की मचाई तबाही के बाद गहड़वाल वंश के राजाओं ने फिर यहां मंदिर का निर्माण करवाया. ये भी कहा जाता है कि बाबर से पहले स्वयं गुरूनानक देवजी ने राम जन्मभूमि आकर भगवान राम के दर्शन किए थे.

इसके बाद वो दौर शुरू हुआ जब बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि का वो विवाद जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब जाकर खत्म हो सका है. और देश एक बदला हुआ जुमला सुन रहा है कि मंदिर वहीं बनाएंगे और तारीख भी बताएंगे. बहुत संक्षेप में वो पुराना विवाद सिलसिलेवार तरीके से याद दिलाते हैं. रामजन्म भूमि पर दंगों का पहला जिक्र 1853 में मिलता है. इसके छह साल बाद 1859 में अंग्रेजों ने मुसलमानों को विवाद ढांचे के अंदर और हिंदुओं को राम चबूतरे पर पूजा करना की इजाजत दे दी. ये सिलसिला कई दशकों तक चला पर अचानक 23 दिसंबर 1949 को कुछ ऐसा घटा की हिंदुओं की भावनाएं फिर जाग गईं. विवादित ढांचे के अंदर यानि मस्जित में राम लला की प्रतिमा विराजित दिखी. जिसके बाद आजाद भारत की सरकार ने ढांचे को विवादित मान कर फिर ताले जड़ दिए.

अब पहुंचते हैं सीधे 1986 में. हिंदुओं की जिद देखकर विवादित ताले का ढांचा फिर खुला, हिंदुओं ने मंदिर के अंदर पूजा अर्चना शुरू की. तीन साल में हालात कुछ ऐसे हुए कि तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास की अनुमति दे दी. ये बात अलग है कि उसके बाद बात आगे नहीं बढ़ सकी. फिर जो हुआ वो इतिहास नहीं ऐसा लगता है जैसे कल ही की बात हो. 1992 में कारसेवकों का अयोध्या पहुंचना वहां जमा होना. और फिर उस ढांचे को गिरा देना जो विवादित  ढांचे के नाम से इतिहास में दर्ज रहा. इसके बाद लंबी कानूनी लड़ाइयां. सरकारी फरमान वो सब कुछ हुआ जो हिंदुस्तान के सरकारी और कानूनी सिस्टम में मुमकिन है. साल दर साल गुजरते रहे. लड़ाई लंबी खिंचती गई. एक दिलचस्प मोड़ तो ये आया कि खुद राम लला को भी एक पक्ष बना दिया गया.

1992 को ढांचा ढहा और इंसाफ मिलते मिलते  नवंबर 2019 हो गया. 9 नवंबर को वो ऐतिहासिक फैसला हुआ जब सुप्रीम कोर्ट ने सदियों पुराने विवाद को सुलझाते हुए राम लला के हक में फैसला सुनाया. ये मोदी 2.0 का दौर है. यानि पीएम नरेंद्र मोदी का दूसरा कार्यकाल. जो इस इतिहास का साक्षी बन गया है.  एक बार फिर भगवान राम की नगरी अयोध्या बसने जा रही है. जो काम किसी दौर में भगवान राम के पुत्र कुश ने किया था वो ताजा दौर में मोदी करने जा रहे हैं. वो वक्त याद आता है जो कहानियों में कुछ यूं सुना है कि जब राम जी लंका विजय कर सीताजी को लेकर फिर अयोध्या लौटे. तो अयोध्या दीपों से जगमगा रही थी. दीवाली मन रही थी. एक बार फिर राम लला आयोध्या लौट रहे हैं. कौशल्या की गोद में. फिर अयोध्या दीपों से जगमगाने वाली है. इस बार देश ने 5 अगस्त को ही दीपावली मनाने की तैयारी शुरू कर दी है.

जूही वर्मा की कलम से


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