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मोदी से पहले इस दलित ने रखी राम जन्मभूमि की पहली शिला

जिन कारसेवकों ने बरसों बरस ये नारा लगाया कि मंदिर वहीं बनाएंगे. उनका सालों पुराना तप अब पूरा होने जा रहा है. राम जन्मभूमि की पावन धरा अयोध्या में राममंदिर निर्माण की पहली शिला रखी जाने वाली है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने हाथों से शिलान्यास करने वाले हैं. विरोध तब भी थे, अब भी हैं. बवाल तब भी हुआ था. अब भी हो रहा है. फर्क केवल इतना है कि बवाल सोशल मीडिया की चार दिवार वाली स्क्रीन में सिमटा हुआ है. जिसके मायने कुछ खास नहीं हैं.

कोरोना काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या पहुंच कर राम जन्मभूमि पर बन रहे मंदिर की शिला रखेंगे. पर ये पहली शिला नहीं होगी. क्योंकि तीन दशक पहले शिला रखने का काम कोई और कर चुका है. ये उस वक्त की बात है जब देश के प्रधानमंत्री थे राजीव गांधी. सारा मामला शुरु हुआ 1984 से. जब तमिलनाडू से ये खबर आई कि मीनाक्षीपुरम में 800 दलितों ने इस्लाम धर्म स्वीर कर कर लिया है. इस घटना के बाद हिंदुओं में रोष था जो राममंदिर निर्माण का जोश बनकर फूटा. 1984 में विश्व हिंदु परिषद ने दिल्ली में धर्म संसद का आयोजिन किया. अशोक सिंहल के भाषण ने हिंदुओं की आत्मा झंझोड़ कर रख दी. कश्मीर के महाराज हरिसिंह के पुत्र कर्ण सिंह ने भी भाषण दिया. जिसके बाद हिंदु एकजुट हुआ और ये तय हुआ कि राम मंदिर में पूजा के लिए यात्रा निकाली जाएगी. इसके बाद यात्राओं का सिलसिला शुरू हो गया. जब इस तरह की यात्राएं बढ़ती गईं तब 1986 में राजीव गांधी की सरकार ने अयोध्या में विवादित ढांचे के ताले खुलवा दिए. 

राम भक्तों के लिए इतना काफी नहीं था. वो तो राम लल्ला की जन्म स्थली पर राम मंदिर बनते देखना चाहते थे. विवादित ढांचे खुलने के बाद से ही संघ बड़े स्तर पर तैयारियां करता रहा. और नवंबर 1989 में मंदिर के शिलान्यास का कार्यक्रम रखा गया. पर शिलान्यास करेगा कौन ये बड़ा सवाल था. बड़े हिंदुवादी नेता कतार में थे. लेकिन शिलान्यास के लिए चुना गया बिहार के कामेश्वर चौपाल को. चौपाल काफी कम उम्र से ही संघ से जुड़े हुए थे. दलित थे. लिहाज उन्हें बिलकुल उम्मीद नहीं थी कि राम मंदिर की पहली शिला रखने का मौका उन्हें मिलेगा. 9 नवंबर के उस दिन भी वो अयोध्या में अपने टेंट में थे. अशोक सिंहल के करीबी ने उनके टेंट में पहुंच कर उन्हें  चौंका दिया. और जो संदेश दिया वो तो और भी  ज्यादा हैरान करने वाला था. उस व्यक्ति ने कहा कि शिलान्य के लिए आपको चुना गया है. सुनकर यकीन तो नहीं हुआ फिर भी कामेश्वर चौपाल शिलान्यस स्थल पर पहुंचे. उस वक्त चौपाल विश्व हिंदु परिषद के जॉइंट सेक्रेटरी भी थे. नींव का पहला पत्थर रखने की अनुभूति आज भी कामेश्वर चौपाल नहीं भूल सके हैं. कहते हैं. वो क्षण हमेशा मुझे गर्व का अहसास करवाता है. चौपाल से पहली शिला रख कर विश्व हिंदु परिषद ने दलितों के सामूहिक धर्म परिवर्तन पर बड़ा संदेश देने की कोशिश की थी. 

अब कामेश्वर चौपाल 66 साल के हो गए हैं. लेकिन वो पल भुलाए नहीं भूल पाते. जिसने उन्हें नाम और सम्मान दोनों दिया. राम मंदिर की नींव के लिए पहली ईंट रख कर चौपाल इतने प्रसिद्ध हुए कि उन्हें बिहार विधान परिषद का सदस्य भी बनाया गया. अब जब राम मंदिर बनने का सपना साकार होता दिखाई दे रहा है और सारे विवाद खत्म हो चुके हैं तब कामेश्वर चौपाल को फिर से तीस बरस पुराना वही वक्त याद आ रहा है.


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