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कैसे करें पितरों का श्राध्द, जिससे पितृ हो खुश

भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से पितरों का दिन प्रारंभ हो रहा है जो अमावस्या तिथि तक रहेगा. 6 सितंबर से पितृ पक्ष शुरु हो रहे हैं. 19 सितंबर को अमावस्या एवं चतुर्दशी का श्राद्ध होगा. जबकि अन्य श्राद्ध क्रम से ही होंगे. ज्योतिषों के अनुसार अपराह्न व्यापिनी तिथि में ही श्राद्ध करना चाहिए.
पितरों का पितृ पक्ष के साथ विशेष संबंध माना जाता है. श्राद्ध कर्म परलोक में सूक्ष्म शरीर धारी जीव की तृप्ति कराता है. माना जाता है कि श्राद्ध कर्म से पितर अन्न-जल से तृप्त होकर अपना शुभ आशीर्वाद देते हैं.  

जिस स्त्री का पुत्र न हो, वह स्वयं अपने पति का श्राद्ध कर सकती है. श्राद्ध तिथि पर जल, तिल, कुश, दूध, पुष्प अक्षत आदि का तर्पण किया जाता है. ब्राह्मूणों को भोजन, पंचबलि, गाय, कौआ, कुत्ता, अग्नि, चीटियों के लिए अन्न दिया जाता है. जिस दिन श्राद्ध की तिथि रहे उस दिन अपराह्न काल में ही श्राद्ध करें. 
दिन में 1.12 मिनट से 3.36 मिनट तक अपराह्न काल होता है. इस दिन कुतुप बेला में अर्थात दिन का आठवां मुहूर्त प्रात: 11.36 मिनट से 12.24 मिनट तक का समय श्राद्ध के लिए उत्तम होता है. वर्षभर में कम से कम दो बार श्राद्ध करना अनिवार्य है. पितृ पक्ष में और मृत्यु तिथि पर. जिस दिन या तिथि पर मृत्यु होती है, उस पुण्य तिथि पर श्राद्ध करने का विधान है.


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