liveindia.news

क्या इतिहास में कोई पद्मावती थी भी?

भंसाली की यह फ़िल्म रानी पद्मावती और तुर्क शासक अलाउद्दीन खिलज़ी की कथित प्रेम कहानी पर केंद्रित है. राजस्थान में राजपूत जाति से ताल्लुक रखने वाले कुछ लोगों का कहना है कि अलाउद्दीन और रानी पद्मावती के बीच कोई प्रेम संबंध नहीं था.

अचानक से 16वीं शताब्दी के हिन्दी साहित्य 'पद्मावत' की यह किरदार पद्मावती फिर से ज़िंदा हो गई है. कहा जा रहा है कि जिस पद्मावती पर विवाद है, दरअसल वह ऐतिहासिक नहीं साहित्यिक किरदार थी. 

इसी मुद्दे पर बीबीसी संवाददाता रजनीश कुमार ने जेएनयू में मुगलकालीन इतिहास के प्रोफ़ेसर नजफ़ हैदर से बात की.

प्रोफेसर हैदर के अनुसार

संजय लीला भंसाली ने फ़िल्म को ऐतिहासिक बताया है और यही उनकी समस्या है. अगर आप ये कहें कि यह हिस्ट्री नहीं है यह फ़िक्शन है तो किसी को कोई ऐतराज न हो. ये सारी समस्या ही तब होती है जब आप इसे इतिहास के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं. ऐसा अपनी फ़िल्म को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए किया जाता है. इसके बाद जो दिल चाहता है, उसे दिखाते हैं. इनके पास क्रिएटिव लाइसेंस भी होता है. यहां यही विरोधाभास है. 

अगर आप शुरू से ही इसे फिक्शन मानते हैं और थोड़ी बहुत ऐतिहासिक चीज़ों का इस्तेमाल भी करते हैं तो कोई दिक़्कत नहीं है. यदि आप इसे फिक्शन बताएंगे तो लोग इसे इतिहास के रूप में नहीं देखेंगे और उन्हें उस रूप में ग़ुस्सा भी नहीं आएगा.

 

इसके साथ ही यह बात भी है कि असहमति को दिखाने का एक सभ्य तरीका होता है. इसमें उद्दंडता नहीं आनी चाहिए. किसी भी सभ्य समाज में यह स्वीकार्य नहीं होगा. हिन्दुस्तान में इस तरह की जो फ़िल्में बनाई जाती हैं उन्हें ऐतिहासिक बता दिया जाता है.

पद्मावती का जो पूरा किस्सा है वो इतिहास है नहीं. 16वीं शताब्दी में एक साहित्य लिखा गया था. इसमें पद्मावती नाम के किरदार की चर्चा है. अलाउद्दीन के ज़माने में तो पद्मावती का कोई ज़िक्र ही नहीं है. पद्मावती एक साहित्यिक किरदार थी न कि ऐतिहासिक किरदार. इसका कोई ऐतिहासिक रूप नहीं है. 

लेकिन भारतीय जनमानस में पद्मावती को इतनी लोकप्रियता कैसे मिली?

हैदर बताते हैं- साहित्यिक चीज़ें ज़्यादा लोकप्रिय होती हैं. गंभीर ऐतिहासिक वाकये या उनकी व्याख्या आसानी से जनमानस में नहीं जगह बना पाते हैं. ऐसी प्रवृत्ति हर जगह है और यह हमारे देश में भी है. जो ज़्यादा दिलचस्प है वो ज़्यादा लोकप्रिय होगी और जिन वाकयों से दिलचस्पी पैदा नहीं होती है वे लोकप्रियता हासिल नहीं कर पातीं. 


Leave Comments