भारत के ग्रामीण क्षेत्र और सरकारा कार्यक्रम

भारत में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के समय ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक "ग्राम स्वराज" में लिखा था कि किसी भी देश का विकास उसके वार्षिक बजट से तय होता है जिस देश में शिक्षा, रक्षा और स्वास्थ्य का बजट देश के कुल बजट का 30 प्रतिशत नही हो सकता उस देश का विकास सम्भव नहीं है. भारत को आजाद हुए आज सत्तर साल से अधिक का समय हो चुका है और आज भी हम इन तीन मंत्रालयों का बजट कुल बजट का 30 प्रतिशत नहीं कर पाएं हैं. भारत आज भी अपने सकल घरेलू उत्पाद का कुल 1.2 प्रतिशत खर्च करता है जो कि हमारे लिए बड़ी चिंता का विषय है.
 
देश की रीढ़ माने जाने वाले गांवों को भी हमने स्वास्थ्य सेवाएं 2005 से राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के द्वारा देना प्रारंभ की हैं जिसकी जमीनी क्या है वो हम सभी जानते हैं. आज देश के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 1,53,655 स्वास्थ्य उपकेंद्र, 23,508 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 5,396 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं एवं देश मे कुल 7,54,724 बिस्तरों वाले कुल 19,653 सरकारी अस्पताल हैं जिनमें ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 15,818 अस्पताल हैं. 

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा के लोकसभा में दिए गए बयान के मुताबिक देश में आबादी के हिसाब से अब भी 22 प्रतिशत स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है. क्या ये कमी नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित इस सलाह से पूरी हो पायेगी की सरकारी जिला चिकित्सालय निजी चिकित्सालयों के साथ मिलकर काम करें. 
मेडिकल जर्नल 'द लैंसेट' में प्रकाशित 'ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज स्टडी' के अनुसार, स्वास्थ्य सेवा से जुडी 195 देशो की सूची में भारत 154वें नम्बर पर है.

केंद्रीय स्वास्थ्य अन्वेषण ब्यूरो के 2016 के आंकडों के अनुसार भारत में जीवन प्रत्यासा दोगुनी हुई है. भले ही भारत में शिशु मृत्यु दर घटी है, स्माल पाक्स, पोलियो और कुष्ठ रोग लगभग जड़ से खत्म हो गए हैं तथापि भारत के लोग कुपोषण, स्वच्छता और संक्रामक रोगों से अभी भी जूझ रहे हैं. क्या इन समस्याओं का समाधान निजी क्षेत्र है?


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